माता मुरारी देवी जी की अमर कथा -छोटी काशी में स्थित माता रानी का भव्य मंदिर जहाँ होती है हर भक्तो की मनोकामनयें पूर्ण
जय माता दी दोस्तों
वैसे तो हिमाचल प्रदेश में बहुत ही ज्यादा देवी देवताओं के मंदिर है। सभी मंदिरो की और देवी देवताओं की अपनी अपनी गाथाएँ है। और सायद इसलिए ही हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। और हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी को शिव की नगरी यानि छोटी काशी के नाम से प्रशिद्ध है. तो दोस्तों आज हम छोटी काशी में ही स्थित एक ऐसी जगह का जिक्र करेंगे जो बहुत ही सुन्दर स्थान है।यहां पर माता मुरारी देवी जी का मंदिर स्थित है. छोटी काशी के सुन्दर नगर में सिकंदरा धार की चोटी पर माता रानी का भव्य मंदिर और माता रानी विराजमान है साथ ही बाबा सिद्ध गोदरड़िया का भी मंदिर है। माता मुरारी धार से सुन्दर नगर, बिलासपुर सरकाघाट का और पहाड़ी के शीर्ष का मनोरम दृश्य मन को मोह लेता है
तो दोस्तों आज हम माता मुरारी के मंदिर के इतिहास और कहनी की बात करेंगे.
माँ मुरारी देवी जी की अमर गाथा
प्राचीन काल में जब पृथ्वी पर देत्या हुआ करते थे तो यहां पर मूर नामक एक पराक्रमी दैत्य हुआ। उस दैत्य ने देवताओं को पराजित करने के उद्देश्य से ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की और उनसे वरदान अमर होने का वरदान माँगा और कोई भी देवता या मानव मुझे मार न सके। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं विधि के विधानों से बन्धा हुआ हूं , तो तुम्हें अमर होने का वरदान नहीं दे सकता, परन्तु मैं तुम्हें ये वरदान देता हूं कि तुम्हरी मृत्यु किसी भी देव, मानव या जानवर के द्वारा नहीं होंगी बल्कि एक कन्या के हाथों से तुम्हारी मृत्यु होंगी
माता रानी के अवतार लेने का कारण
तब घमण्डी मुरा राक्षश ने सोचा कि मैं इतना शक्तिशाली हूं एक साधारण एवं अबला कन्या मेरा वध कहां कर सकेगी मैं तो अमर हो गया । ये सोचकर उस दैत्य ने पृथ्वी लोक पर अत्याचार करने शुरू कर दिये और साथ में स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को पराजित करके स्वर्ग लोक से निकल दिया।और स्वयं स्वर्ग का राजा बन गया समस्त सृष्टि उसके अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर उठी। वो असुर बहुत उपद्रव मचाता था जिस से प्राणियों को बहुत कष्ट सहना पड़ रहा था।
माता रानी का अवतार
इस स्थिति को देखकर सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए, तो भगवान ने कहा चिंता मत करो, मैं अवश्य आपके कष्टों का निवारण करूँगा । भगवान विष्णु और मूर दैत्य का आपस में युद्ध आरम्भ हो गया जो बहुत लम्बे समय तक चलता रहा तक युद्ध को समाप्त न होता देख कर भगवान नारायण को ज्ञात हुआ की मूरा का वध केवल कन्या के हाथों ही हो सकता है, ऐसा विचार करके वो हिमालय में स्थित सिकन्दरा धार नामक पहाड़ी पर एक गुफा में जाकर लेट गए।
मूरा उनको ढूंढता हुआ वहां पहुंचा तो उस ने देखा की भगवान निद्रा में हैं और हथियार से भगवान पे वार करूं, ऐसा सोचा तो भगवान के शरीर से 5 ज्ञानेद्रियों, 5 कर्मेंद्रियों, 5 शरीर कोषों और मन ऐसी 16 इन्द्रियों से एक कन्या उत्पन्न हुयी। उस कन्या का नाम माता मुरारी था उस कन्या ने मूरा को युद्ध के लिए ललकारा। तब कन्या और मुरा का घोर युद्ध हुआ। उस देवी ने अपने शस्त्रों के प्रहार से मुरा को मार डाला। मूर दैत्य का वध करने के कारण भगवान विष्णु ने उस दिव्या कन्या को मुरारी देवी के नाम से संबोधित किया। एक अन्य मत के अनुसार भगवान विष्णु जिन्हें मुरारी भी कहा जाता है, उनसे उत्पन्न होने के कारण ये देवी माता मुरारी के नाम से प्रसिद्ध हुईं एवं उसी पहाड़ी पर दो पिण्डियों के रूप में स्थापित हो गयीं जिनमें से एक पिण्डी को शान्तकन्या और दूसरी पिण्डी को कालरात्री का स्वरूप माना जाता है।माँ मुरारी के कारण सिकंदरा धार पहाड़ी मुरारी धार के नाम से प्रसिद्ध हुई।
भव्य मंदिर का निर्माण
द्वापर युग में जब पांडव अपना अज्ञातवास काट रहे थे, तब वो इस स्थान पर आये। और माता मुरारी देवी ने उन्हें दर्शन देकर उपदेश दिया की कि पहाड़ की चोटी पर जाकर खुदाई करो, वहां पर तुम्हें मेरी दो पिण्डियां मिलेंगी। उस स्थान पर उन पिण्डियों की स्थापना करो। माता के आदेशनुसार पांडवों ने वहां पर खुदाई करके एक भव्य मन्दिर का निर्माण किया। आज भी मन्दिर से थोड़े नीचे जाकर देखें तो वहां पर पांडवों के पदचिन्ह कुछ पत्थरों पर स्थापित है।
मुरारी माता ने अपनी उपस्थिति का प्रभाव इस क्षेत्र के लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कराकर उद्धार किया है। इसी तरह लोगों की आस्था बढ़ती गयी और 1992 में इस क्षेत्र के लगभग एक दर्जन गावों के माता भक्तों ने एक कमेटी गठित की एवं उसके बाद माता की भक्ति में श्रद्धा रखने वालों के आर्थिक सहयोग एवं कमेटी की निष्ठा, सेवाभाव, इमानदारी, श्रद्धा व समर्पण की भावना से एक-एक पुष्प से यहां पर आज विशाल गगनचुम्बी भव्य मन्दिर, सरायं, भंडारा भवन व संपत्ति रूपी धरोहर इस शक्तिपीठ बन चूका है मुरारीदेवी मन्दिर परिसर में ही सन् 2005 से अटूट भंडारे का शुभारंभ बाबा कल्याण दास (काला बाबा जी)द्वारा किया गया। मन्दिर सरायं में एक हज़ार से अधिक श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था है।और साथ ही माता रानी कर दरवार में हर वर्ष मई महीने में एक तीन दिवशीया मेले का आयोजन किया जाता है।तो आप भी एक बार जरूर माता रानी के दर्शन करने आये.
माता मुरारी देवी के दर्शन के लिए आप पैदल और सड़क मार्ग से ही आ सकते है यह सुन्दर नगर से लगभग 25 किलोमीटर दुरी पर स्थित है।आप सभी मित्रो का बहुत धन्यबाद माता रानी आप सभी की मनोकामना पूर्ण करे!

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